जेएएच कैंपस में स्थित करीब 35 हजार स्क्वायर फीट जमीन को हाईकोर्ट ने जीडीए के मालिकाना हक की मानी

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ग्वालियर
हाईकोर्ट की एकल पीठ ने जेएएच कैंपस में स्थित करीब 35 हजार स्क्वायर फीट जमीन के मामले में फैसला सुना दिया है। जमीन को जीडीए के मालिकाना हक की मानी है। जीडीए अपनी करोड़ों की जमीन को बचाने में कामयाब हो गया। वहीं दूसरी ओर जमीन पर दावा करने वालों पर कोर्ट ने 20 हजार रुपए का हर्जाना भी लगाया है।
 
जेएएच कैंपस में सर्वे क्रमांक 1647, 1648, 1650, 1651, 1652 पर अस्पताल प्रबंधन व जीडीए के बीच कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाने का करार हुआ था। 1999 में कॉम्प्लेक्स बनाने की अधिसूचना जारी हुई तो सुरेश कुकरेजा व लक्ष्‌मी सिंह ने जमीन पर दावा पेश कर दिया। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि 1940 में गोधना नाम व्यक्ति मोरुशी कृषक के नाम से दर्ज था। गोधना से यह जमीन उन्होंने क्रय कर ली। कोर्ट में गोधना का नाम खसरों में दर्ज होने का कोई रिकार्ड वह जिला कोर्ट में पेश नहीं कर पाए। इस कारण जिला कोर्ट ने उनके दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद सुरेश कुकरेजा व लक्ष्‌मी सिंह ने हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट के आदेश के बाद कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना लटक गई। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ जीडीए ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए हाईकोर्ट में केस लौटा दिया कि जीडीए को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाए। फर्स्ट अपील हाईकोर्ट में फिर से सुनी गई। जीडीए की ओर से अधिवक्ता राघवेन्द्र दीक्षित ने तर्क दिया कि गोधना का नाम दर्ज करने में फर्जीवाड़ा किया गया। 40 साल बाद जमीन का नामांतरण क्यों कराया गया। याचिका में कलेक्टर के आदेश को छिपाया गया। कलेक्टर ने तहसीलदार के नामांतरण करने के आदेश को निरस्त कर दिया था। दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया गया है। जबकि यह जमीन शुरू से ही लोक सुधार न्यास के नाम से दर्ज थी। कोर्ट जीडीए के तर्कों से सहमत हो गया और जमीन जीडीए के मालिकाना हक की मानी। वर्तमान में इस जमीन की कीमत करोड़ों में है।