असुरक्षा का दंश

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इस समय देश में जहां देखो बलात्कार की खबरें आ रही हैं। फोर्टिस अस्पताल में वेंटिलेटर पर पड़ी एक मरीज के साथ चार दिनों तक बलात्कार होना अमानवीयता की पराकाष्ठा है। जब नामी गिरामी अस्पताल ही सुरक्षित नहीं होंगे तो बीच सड़क का हाल तो छोड़ ही दीजिए। बलात्कार के ऐसे मामले बताते हैं कि ऐसे असुरक्षित परिवेश में बेटियों के पढऩे और आगे बढऩे की स्थितियां बेहद चिंतनीय हैं। यह जघन्यता और बर्बरता अब हद दर्जे तक बढ़ चुकी है कि बेटियां न अकेली सुरक्षित हैं और न ही अपनों के साथ। आखिर लड़कियों के मान को कुचलने, उनकी जिंदगी छीन लेने की यह बर्बर मानसिकता कहां से पोषण पा रही है? आज के युवाओं में कैसी सोच जड़ें जमा रही है कि न कानून का डर है और न ही समाज की चिंता। देश में अब बर्बर आपराधिक मानसिकता के बढ़ते आंकड़ों के आगे सरकार, समाज और कानून सब बेबस लगते हैं।

विचारणीय यह भी है कि ऐसी घटनाएं बेटियों की सुरक्षा से जुड़े दुर्भाग्यपूर्ण हालतों की ही नहीं समाज में पनप रही विद्रूप मानसिकता की भी बानगी हैं। दरअसल, बेटियों के प्रति सोच का दायरा आज भी बरसों पहले की तयशुदा सोच तक ही सिमटा है। तभी तो ऐसे मनचलों को एक लड़की का न कहना भी स्वीकार्य नहीं। बिना किसी खता के ही जिंदगी छीन लेने, जिंदा जला देने के इन मामलों के पीछे की यही संकीर्ण सोच है। पुरुष मानसिकता को यह स्वीकार ही नहीं है कि कोई महिला उसकी आकांक्षा के विपरीत अपनी भी एक स्वतंत्र सोच भी रख सकती है, अपने साथ हो रहे अपमानजनक बर्ताव का विरोध भी कर सकती है।